अहं का स्वभाव होता है अपनी ओर खींचना, और आत्मा का स्वभाव होता है बाहर की तरफ़ देना—इसलिए दोनों के जुड़ जाने से एक भयंकर जटिलता की सृष्टि हो जाती है।
सबकी भलाई में हमारी भलाई निहित है।
हम एक-दूसरे का भलाई में मुक़ाबला करें तो हम सब ऊँचे होकर काम कर सकते हैं।
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न संख्या-शक्ति, न धन, न पांडित्य, न वाक्चातुर्य—कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुद्ध जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी।
यह जीवन आता और जाता है—नाम, यश, भोग, यह सब थोड़े दिन के हैं। संसारी कीड़े की तरह मरने से अच्छा है, कहीं अधिक अच्छा है—कर्तव्य क्षेत्र में सत्य का उपदेश देते हुए मरना। आगे बढ़ो।
मनुष्य का सर्वोपरि उद्देश्य, सर्वश्रेष्ठ पराक्रम धर्म ही है और यह सब से आसान है।
स्वयं अच्छे बनो और जो कष्ट पा रहे हैं, उनके प्रति दया-संपन्न होओ। जोड़-गाँठ करने की चेष्टा मत करो, उससे भवरोग दूर नहीं होगा। वास्तव में हमें जगत् के अतीत जाना पड़ेगा।
योगी को चाहिए कि वे तन-मन-वचन से किसी के विरुद्ध हिंसाचरण न करें। दया मनुष्य-जाति में ही आबद्ध न रहे, वरन् उसके परे भी वह जाए और सारे संसार का आलिंगन कर ले।
हर एक मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे मनुष्य को इसी तरह, अर्थात् ईश्वर समझकर सोचे और उससे उसी तरह अर्थात् ईश्वर-दृष्टि से बर्ताव करे; उसे घृणा न करे, उसे कलंकित न करे और न उसकी निंदा ही करे। किसी भी तरह से उसे हानि पहुँचाने की चेष्टा भी न करे। यह केवल संन्यासी का ही नहीं, वरन् सभी नर-नारियों का कर्त्तव्य है।
ईश्वर मुझे काफ़ी सेहत और विवेक दे जिससे मैं मानव जाति की सेवा कर सकूँ।
आपदग्रस्ता नारी के सम्मान की रक्षा में मिट जाने वालों की संख्या नगण्य ही है, परंतु अपनी कुचेष्टाओं से उसका अनादर करने वाले पग-पग पर मिलेंगे।
शिक्षा के क्षेत्र में एक पुरुष अपनी स्वभाव-सुलभ कठोरता से असफल रह सकता है, परंतु माता के सहज स्नेह से पूर्ण हृदय लेकर; जब एक स्त्री उसी उग्रता का अनुकरण करके अपने उत्तरदायित्व को भूल जाती है, तब उसकी स्थिति दयनीय के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहती।
यदि आपका दृष्टिकोण अच्छा है, तो प्रतिक्रिया भी अच्छी मिलेगी। अगर दृष्टिकोण ग़लत है, तो प्रतिक्रिया भी ग़लत ही मिलेगी।
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जो मनुष्य बिना दिए खाता है और ऐसे खाने में सुख मानता है, वह पाप का भागी होता है।
यदि स्वभाव में समता न भी हो, तो भी सबको समान सुविधा मिलनी चाहिए। फिर भी यदि किसी को अधिक तथा किसी को कम सुविधा देनी हो, तो बलवान की अपेक्षा दुर्बल को अधिक सुविधा प्रदान करनी आवश्यक है।
अनंत धैर्य, अनंत पवित्रता तथा अनंत अध्यवसाय—सत्कार्य में सफलता के रहस्य हैं।
जिस समाज में सदाचार पर श्रद्धा और अत्याचार पर क्रोध प्रकट करने के लिए जितने ही अधिक लोग तत्पर पाए जाएँगे, उतना ही वह समाज जागृत समझा जाएगा।
जो सुखकर हैं उन्हें प्रणाम करो और जो दु:खकर हैं उन्हें भी प्रणाम करो, ऐसा होने पर ही तुम स्वास्थ्य लाभ करोगे, शक्ति लाभ करोगे—जो शिव हैं, जो शिवकर हैं, उन्हें ही प्रणाम करना होगा।
करुणा की गति रक्षा की ओर होती है और प्रेम की रंजन की ओर। लोक में प्रथम साध्य रक्षा है, रंजन का अवसर उसके पीछे आता है। अतः साधनावस्था या प्रयत्नपक्ष को लेकर चलनेवाले काव्यों का बीजभाव, करुणा ही ठहरता है।
किसी कर्म में प्रवृत्त होने से पहले, यह स्वीकार करना आवश्यक होता है कि वह कर्म या तो हमारे लिए या समाज के लिए अच्छा है। इस प्रकार की स्वीकृति कर्म की पहली तैयारी है।
दुनिया के जितने धर्म हैं वे सब अच्छे हैं, क्योंकि वे भलाई सिखाते हैं। जो दुश्मनी सिखाते हैं, उनको मैं धर्म नहीं मानता।
टेढ़े रास्तें से सीधी बातको नहीं पहुँचा जा सकता।
कबीर जिस लोकधर्म का विकास कर रहे थे, उसका मुख्य लक्ष्य है मानुष सत्य या मनुष्यत्व का विकास।
यह जगत् सदा ही भले और बुरे का मिश्रण है। जहाँ भलाई देखो, समझ लो कि उसके पीछे बुराई भी छिपी है।
जिनकी भावना किसी बात के मार्मिक पक्ष का चित्रानुभव करने में तत्पर रहती है, जिनके भाव चराचर के बीच किसी को भी आलम्बनोपयुक्त रूप या दशा में पाते ही उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं, वे सदा अपने लाभ के ध्यान से या स्वार्थबुद्धि द्वारा ही परिचालित नहीं होते।
करुणा और सात्विकता का संबंध इस बात से और भी सिद्ध होता है कि किसी पुरुष को दूसरे पर करुणा करते देख, तीसरे को करुणा करनेवाले पर श्रद्धा उत्पन्न होती है।
कीर्ति-लोभ मनुष्य को बहुत-से सुकर्मों के लिए प्रेरित करता है।
श्रद्धा स्वयं ऐसे कर्मों के प्रतिकार में होती है; जिनका शुभ प्रभाव अकेले हम पर नहीं, बल्कि सारे मनुष्य समाज पर पड़ सकता है।
पक्षपात ही सब अनर्थों का मूल है, यह न भूलना। अर्थात् यदि तुम किसी के प्रति अन्य की अपेक्षा अधिक प्रीति-प्रदर्शन करते हो, तो याद रखो—उसीसे भविष्य में कलह का बीजारोपण होगा।
सदाचारी के प्रति यदि हम श्रद्धा नहीं रखते, तो समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करते।
जो भक्त होना चाहता है; वह दुष्ट प्रकृति के मनुष्यों के साथ भोजन न करे, क्योंकि उनकी दुष्टता का भाव भोजन द्वारा फैलता है।
करुणा का विषय दूसरे का दुःख है, अपना दुःख नहीं।
मेरा मूलमंत्र है कि जहाँ जो कुछ अच्छा मिले, सीखना चाहिए।
समग्र विश्व को प्रेम अपने घर जैसा बना लेता है।
संत और भक्त कवि, लोकमंगल की भावना से प्रेरित और लोकमंगल की साधना के कवि थे।
दुनिया का इतिहास इस बात का साक्षी है कि शुभ के समान अशुभ भी क्रमशः बढ़ ही रहा है।
आप नकारात्मक चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करके दुनिया की मदद नहीं कर सकते हैं। जब आप दुनिया में होने वाली नकारात्मक घटनाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आप न सिर्फ़ उन्हें बढ़ाते हैं, बल्कि अपनी ज़िंदगी में आने वाली नकारात्मक चीज़ों को भी बढ़ा लेते हैं।
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रामकृष्ण परमहंस ने भिन्न-भिन्न धर्मों की साधना स्वयं करके, सब धर्मों की एकरूपता प्रत्यक्ष कर ली। तुकराम ने अपनी उपासना के सिवा दूसरे किसी की भी उपासना न करते हुए भी, सारी उपासनाओं का सार जान लिया। जो स्वधर्म का निष्ठा से आचरण करेगा, उसे स्वभावतः ही दूसरे धर्मों के लिए आदर रहेगा।
यह धारणा कि शुभ और अशुभ ये दोनों पृथक् वस्तुएँ हैं और अनंत काल से चले आ रहे हैं—नितांत असंगत है।
क्या दुनिया पारस्परिकता पर चलती है? इसका मतलब है कि आप जो अच्छे कर्म करेंगे, वह आपके साथ होगा और जो बुरे कर्म करेंगे—वह भी आपके साथ होगा।
अहिंसा को ठीक रूप में अपनाने में हमारी ही नहीं, संसार की भलाई है।
हमें अज्ञान और अशुभ का नाश करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए, केवल यह समझ लेना है कि शुभ की वृद्धि से ही अशुभ का नाश होता है।
जब आप अपने समृद्ध जीवन की कल्पना करते हैं, तो आप आकर्षण के नियम द्वारा सशक्त और सचेतन रूप से अपने जीवन का निर्माण कर रहे हैं।
लोभ जिसमें है, फिर उसमें अन्य अवगुण क्या चाहिए? जो कुटिल है, उसे और पातक करने की क्या आवश्यकता है? सत्यवक्ता को तप का क्या प्रयोजन है? जिसका मन शुद्ध है, उसे तीर्थ करने से क्या अधिक फल होगा? जो सज्जन हैं, उन्हें मित्र और कुटुंब की क्या कमी है? यशस्वी पुरुषों के लिए यश से बढ़ कर क्या भूषण है।
राम और रावण के बीच की भारी लड़ाई में, राम भलाई की ताक़तों के प्रतीक थे और रावण बुराई की ताक़तों का। राम ने रावण पर विजय पाई, और इस विजय से हिंदुस्तान में रामराज्य क़ायम हुआ।
दया अथवा क्रोध परमात्मा को ही शोभा देता है। मनुष्य की भलाई केवल धैर्य धारण करने और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकाश करने में ही है।
अच्छे काम के प्रति आदर और बुरे के प्रति तिरस्कार होना ही चाहिए। भले-बुरे काम करने वालों के प्रति सदा आदर अथवा दया रहनी चाहिए।
साहित्य अच्छे आदमी का निर्माण संभवतः इसी तरह करता है कि वह अपने से जुड़ने वाले को अन्यायी, अपराधी और निरर्थक ईर्ष्याओं का पात्र नहीं बनने देता।
कवि को दुश्चरित्रों, दुश्शीलों, पतितों, अटकों, भटकों और अपराधियों तक के प्रति, मानवीय ज़िम्मेदारी और करुणा से भरा हुआ होना चाहिए।